चंडीगढ़, 23 जुलाई: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में इंसाफ के दरवाज़े तक पहुंचने की एक तस्वीर ने न केवल आंखें नम कर दीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
यह कहानी किसी काल्पनिक पात्र की नहीं, बल्कि कुंजी गांव के रहने वाले दिव्यांग अशोक की है — एक ऐसा व्यक्ति जो खुद चल नहीं सकता, लेकिन अपनी दिव्यांग पत्नी को पीठ पर लादकर घुटनों के बल डीएम कार्यालय तक जा पहुंचा। ना चप्पल, ना सड़क, ना सहारा… बस उम्मीद की डोर थामे वो रेंगता रहा।
तपती दोपहर, नंगे पैर और घुटनों के बल — इंसाफ की यह कैसी यात्रा?
घटना को देखकर हर कोई सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर एक व्यक्ति गर्म फर्श पर घुटनों के बल क्यों रेंग रहा है?
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अशोक के पास चप्पल नहीं थी, शरीर पर केवल एक गमछा था
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गर्म जमीन की तपिश से बचने के लिए उसने घुटनों पर गमछा लपेटा
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और पीठ पर उसकी पत्नी, जो खुद भी चलने में असमर्थ है
ये दृश्य श्रवण कुमार की उस कहानी की याद दिलाता है, जिसे हमने पुस्तकों में पढ़ा था। फर्क सिर्फ इतना है कि अशोक तीर्थ नहीं, न्याय की तलाश में निकला है।
ना रास्ता, ना सहूलियत — कीचड़ में फंसी जिंदगी
अशोक ने बताया कि गांव में चकबंदी का काम चल रहा है, लेकिन उनके घर तक जाने के लिए कोई पक्का रास्ता नहीं बनाया गया है।
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बारिश के मौसम में दलदल और कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता है
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दिव्यांग होने के कारण वे अपनी त्रि-चक्र साइकिल का इस्तेमाल भी नहीं कर पाते
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ऐसे में उनकी पत्नी को कंधे या पीठ पर उठाना ही एकमात्र विकल्प है
पहले भी कर चुके हैं गुहार, पर जवाब नहीं आया
यह पहली बार नहीं है जब अशोक ने मदद की अपील की हो।
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पहले भी डीएम कार्यालय में आवेदन दे चुके हैं
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लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई
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अब उन्होंने सोचा कि शायद उनकी ये स्थिति देखकर ही प्रशासन जाग जाए
एक छोटी-सी मांग, जो जीवन को बदल सकती है
अशोक की मांग कोई विशेषाधिकार नहीं, बस एक छोटा-सा पक्का रास्ता है — जिससे वे इज्जत और सहूलियत के साथ अपना जीवन जी सकें।
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“जब चकबंदी का काम चल रहा है, तो उसमें मेरे घर तक रास्ता जोड़ दिया जाए,” अशोक की यही बस एक उम्मीद है
यह सिर्फ एक फरियाद नहीं, यह व्यवस्था के प्रति आईना है
ऐसे दृश्यों को देखकर सवाल उठता है:
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क्या सिस्टम इतना असंवेदनशील हो गया है कि एक नागरिक को रेंगकर इंसाफ मांगना पड़े?
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क्या दिव्यांग होना इस देश में अब भी उपेक्षा झेलने की वजह है?
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क्या एक पक्का रास्ता देने के लिए भी इतने घाव और अपमान जरूरी हैं?

