चंडीगढ़, 1 जुलाई: हर साल 1 जुलाई, देश के डॉक्टर्स के समर्पण और सेवाभाव को सलाम करने का दिन होता है – राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस। यह दिन महान चिकित्सक डॉ. बिधान चंद्र रॉय की जयंती और पुण्यतिथि की स्मृति में मनाया जाता है। लेकिन इस साल, जब हम डॉक्टरों को फूल और सम्मान पत्र दे रहे हैं, एक सवाल बेहद जरूरी है – “जो ज़िंदगी बचाते हैं, उनकी ज़िंदगी कौन संजोता है?”
इस साल की थीम – “देखभाल करने वालों की देखभाल” (Caring for the Caregivers) – महज़ एक नारा नहीं, बल्कि एक बेहद ज़रूरी पुकार है।
जब डॉक्टर ही मानसिक पीड़ा में हों…
आज भारत में हजारों डॉक्टर – खासकर रेजिडेंट्स और पोस्टग्रेजुएट मेडिकल छात्र – थकावट, अकेलापन और मानसिक स्वास्थ्य संकट से जूझ रहे हैं। वे दिन-रात अस्पतालों में डटे रहते हैं, जीवन और मौत के बीच की लकीर को थामे रहते हैं, लेकिन अक्सर खुद अपनी ही ज़िंदगी के बोझ तले दब जाते हैं।
चौंकाने वाले आँकड़े:
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2018 से 2023 के बीच 119 मेडिकल छात्रों ने आत्महत्या की।
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इनमें से 58 स्नातकोत्तर (PG) छात्र थे।
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हर 15 दिन में एक आत्महत्या – यह महज ट्रैजेडी नहीं, एक सिस्टम की आपात स्थिति है।
2024 के एक सर्वे में पाया गया:
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तीन में से एक पोस्टग्रेजुएट छात्र ने आत्महत्या का विचार किया।
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10% से अधिक ने आत्महत्या की योजना बनाई थी।
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और लगभग 5% ने प्रयास भी किया।
सिर्फ जून 2025 में कई रेजिडेंट डॉक्टरों की आत्महत्या की खबरें सामने आईं – अधिकतर हॉस्टल के कमरों में, चुपचाप।
बर्नआउट, थकावट और चुप्पी – एक खतरनाक मिश्रण
आईएमए-गोवा के एक अध्ययन के मुताबिक:
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42% डॉक्टरों में बर्नआउट (Burnout) के लक्षण देखे गए।
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12-15% डॉक्टरों ने माना कि वे अत्यधिक शराब का सेवन करते हैं, और इसका कारण बताया – तनाव।
इसके बावजूद, मनोचिकित्सा (Psychiatry) को अब भी कमजोरी या असफलता का प्रतीक माना जाता है। डॉक्टर, जो दूसरों को इलाज की सलाह देते हैं, खुद मदद मांगने से डरते हैं – कहीं उन्हें “अनफिट” ना कह दिया जाए।
“मदद मांगना कमजोरी नहीं, इंसानियत है” – डॉ. अंजलिका अत्रे
मुंबई की मनोचिकित्सक डॉ. अंजलिका अत्रे उन कुछ डॉक्टरों में हैं जो इस चुप्पी को तोड़ने का साहस कर रही हैं। उनका कहना है:
“यहां तक कि स्केलपेल थामने वाले सबसे मजबूत हाथ भी भीतर से कांपते हैं। मदद मांगना आपको डॉक्टर से कम नहीं, इंसान बनाता है।”
उनका क्लिनिक मानसिक स्वास्थ्य को सामान्य चिकित्सा की तरह स्वीकार करने की पहल करता है।
वह तनाव-प्रबंधन, आत्महत्या-रोकथाम रणनीति और दवा उपचार के जरिए डॉक्टरों को सुरक्षित स्थान देती हैं – जहां वे मुक्त होकर टूट सकते हैं, और फिर संभल सकते हैं।
खतरनाक बदलाव – डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा और संस्थागत असंवेदनशीलता
आज जब हम डॉक्टरों के ऊपर फूल बरसा रहे हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि:
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हाल के वर्षों में स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है।
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कई डॉक्टरों ने ऐसे शत्रुतापूर्ण वातावरण में काम करना स्वीकार किया है, जहां संस्थान समर्थन के बजाय चुप्पी साध लेते हैं।
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कई डॉक्टरों को मौत के बाद ही वो सुनवाई और सहानुभूति मिलती है, जो जीते जी कभी नहीं मिली।
क्या बदलाव की कोई उम्मीद है?
अब वक्त है कि हम डॉक्टरों को ‘भगवान का रूप’ नहीं, इंसान मानें – जिसकी भावनाएं, सीमाएं और ज़रूरतें होती हैं।
बदलाव के रास्ते:
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मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य समर्थन प्रणाली अनिवार्य होनी चाहिए।
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छात्रों के लिए काउंसलिंग और मनोचिकित्सकीय पहुंच सहज और गोपनीय बनाई जाए।
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डॉक्टरों के लिए हेल्पलाइन, मानसिक स्वास्थ्य छुट्टी और असहाय महसूस होने पर कार्रवाई का स्पष्ट तंत्र बने।

